धार्मिक उत्सवों में महंगे DJ और रैलियाँ: आस्था, उत्सव या दिखावे की होड़?
# धार्मिक उत्सवों में महंगे DJ और रैलियाँ: आस्था, उत्सव या दिखावे की होड़? भारत में धार्मिक उत्सव केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं। वे हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। गणेश उत्सव, गणेश विसर्जन, दुर्गा विसर्जन, रामनवमी, जन्माष्टमी और अन्य धार्मिक अवसरों पर लोग एक साथ आते हैं, पूजा करते हैं, प्रसाद बांटते हैं और जुलूस या शोभायात्रा निकालते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक जुलूसों का एक पहलू तेजी से चर्चा में आया है—महंगे DJ और बड़े-बड़े साउंड सिस्टम। कई स्थानों पर धार्मिक आयोजन के लिए सार्वजनिक चंदा एकत्र किया जाता है और उसी राशि का बड़ा हिस्सा DJ, साउंड सिस्टम, लाइटिंग और अन्य दिखावटी व्यवस्थाओं पर खर्च किया जाता है। सवाल यह नहीं है कि धार्मिक उत्सव में संगीत होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या धार्मिक आस्था को व्यक्त करने के लिए अत्यधिक महंगे और तेज आवाज वाले DJ सिस्टम पर इतना खर्च करना उचित है? आस्था और प्रदर्शन के बीच की महीन रेखा धार्मिक आयोजन का मूल उद्देश्य क्या है? ईश्वर के प्रति श्रद्धा, सामूहिक प्रार्थना, सामाजिक एकता, सेवा, सद्भाव और अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाना। लेकिन जब किसी आयोजन में यह चर्चा होने लगे कि— "किसका DJ सबसे बड़ा था?" "किसकी गाड़ी सबसे शानदार थी?" "किसकी रैली में सबसे ज्यादा साउंड था?" तो हमें एक बार रुककर सोचना चाहिए कि कहीं धार्मिक आयोजन धीरे-धीरे आस्था से अधिक प्रदर्शन का माध्यम तो नहीं बन रहा? धार्मिक उत्सव में संगीत और उत्साह स्वाभाविक है। समस्या संगीत में नहीं, बल्कि उस मानसिकता में है जिसमें ज्यादा खर्च, ज्यादा आवाज और ज्यादा प्रदर्शन को धार्मिक उत्सव की सफलता का पैमाना मान लिया जाता है। सार्वजनिक चंदे का पैसा आखिर किसके लिए? अधिकांश स्थानीय धार्मिक आयोजनों में चंदा आम लोगों से ही एकत्र किया जाता है। किसी दुकानदार ने ₹500 दिए, किसी मजदूर ने ₹100, किसी कर्मचारी ने ₹1,000, किसी परिवार ने अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग किया। यह पैसा किसी एक व्यक्ति का नहीं होता। यह समुदाय का सामूहिक योगदान होता है। इसलिए यह सवाल पूछना गलत नहीं है कि इस पैसे का उपयोग किस प्रकार किया जा रहा है। यदि लाखों रुपये का चंदा एकत्र होता है और उसका बड़ा हिस्सा केवल कुछ घंटों के DJ, लाइट और शोभायात्रा पर खर्च हो जाता है, तो क्या उसी धन का कुछ हिस्सा समाज के स्थायी हित में भी लगाया जा सकता है? उदाहरण के लिए— - गरीब बच्चों की पढ़ाई में सहायता - जरूरतमंद विद्यार्थियों को किताबें - स्कूल में शैक्षणिक सामग्री - रक्तदान शिविर - स्वास्थ्य जांच शिविर - पौधारोपण - स्वच्छता अभियान - जल संरक्षण - गरीब परिवारों की सहायता - दुर्घटना या आपदा के समय सहायता कोष इससे धार्मिक आयोजन की सामाजिक उपयोगिता कई गुना बढ़ सकती है। ## क्या महंगा DJ धार्मिकता का प्रमाण है? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि कोई व्यक्ति ₹50,000 या ₹1 लाख का DJ लगाता है तो वह अपनी क्षमता के अनुसार खर्च कर सकता है। लेकिन यदि वह पैसा सार्वजनिक चंदे से आया है**, तो मामला अलग हो जाता है। धार्मिकता का संबंध व्यक्ति के खर्च करने की क्षमता से नहीं, बल्कि उसकी श्रद्धा और उसके व्यवहार से होना चाहिए। ईश्वर के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए अत्यधिक महंगे उपकरण आवश्यक नहीं हैं। एक साधारण भजन, ढोल, नगाड़ा, पारंपरिक वाद्य या सीमित ध्वनि व्यवस्था भी लोगों को जोड़ सकती है। DJ से समस्या सिर्फ पैसे की नहीं है अत्यधिक तेज आवाज का प्रभाव केवल आर्थिक नहीं होता। रिहायशी क्षेत्रों से निकलने वाली तेज ध्वनि से— - बुजुर्गों को परेशानी हो सकती है, - छोटे बच्चों की नींद प्रभावित हो सकती है, - विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित हो सकती है, - अस्पतालों और मरीजों को परेशानी हो सकती है, - पशु-पक्षियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है, - और सामान्य नागरिकों के लिए असुविधा पैदा हो सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता के साथ दूसरे नागरिकों के अधिकार भी जुड़े हुए हैं। यदि हमारा उत्सव किसी दूसरे व्यक्ति के लिए लगातार परेशानी का कारण बन रहा है, तो हमें अपनी उत्सव मनाने की शैली पर विचार करना चाहिए। धार्मिक जुलूस या शक्ति प्रदर्शन? शोभायात्रा का उद्देश्य लोगों को जोड़ना और धार्मिक-सांस्कृतिक संदेश देना होना चाहिए। लेकिन कई बार जुलूसों में प्रतिस्पर्धा दिखाई देने लगती है— "हमारा जुलूस बड़ा।" "हमारा DJ बड़ा।" "हमारे पास ज्यादा गाड़ियां।" "हमारे साथ ज्यादा लोग।" यह प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे धार्मिक उत्सव को सामाजिक प्रतिष्ठा और शक्ति प्रदर्शनमें बदल सकती है। धार्मिक आयोजन की सफलता भीड़ की संख्या या DJ की आवाज से नहीं, बल्कि उसके द्वारा पैदा किए गए सद्भाव, अनुशासन और सामाजिक सकारात्मकता** से मापी जानी चाहिए। क्या DJ पूरी तरह बंद कर देना चाहिए? यह भी उचित निष्कर्ष नहीं होगा। संगीत भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा रहा है। समस्या DJ होने में नहीं, बल्कि उसकी सीमा, खर्च और उपयोग के उद्देश्य में है। एक संतुलित रास्ता निकाला जा सकता है। उदाहरण के लिए— DJ हो, लेकिन निर्धारित ध्वनि सीमा में। संगीत हो, लेकिन अस्पताल और रिहायशी क्षेत्रों का ध्यान रखा जाए। जुलूस हो, लेकिन यातायात और आम नागरिकों की सुविधा प्रभावित न हो। चंदा लिया जाए, लेकिन खर्च का हिसाब सार्वजनिक किया जाए। उत्सव मनाया जाए, लेकिन पर्यावरण और समाज की जिम्मेदारी भी निभाई जाए। यही संतुलित धार्मिक उत्सव की पहचान हो सकती है। चंदे में पारदर्शिता क्यों जरूरी है? यदि किसी आयोजन के लिए जनता से चंदा लिया जाता है तो आयोजकों की जिम्मेदारी भी बनती है कि वे आय और व्यय का सामान्य विवरण समुदाय के सामने रखें। उदाहरण के लिए— | खर्च | राशि | |---|---:| | पूजा सामग्री | ₹20,000 | | प्रसाद | ₹15,000 | | DJ/साउंड | ₹30,000 | | सजावट | ₹20,000 | | सामाजिक सेवा | ₹25,000 | | स्वच्छता/अन्य | ₹10,000 | ऐसी पारदर्शिता से लोगों का विश्वास बढ़ेगा। लोगों को यह भी महसूस होगा कि उनका दिया हुआ पैसा केवल कुछ घंटों के मनोरंजन पर खर्च नहीं हुआ, बल्कि उनके समाज के लिए भी उपयोगी बना। एक नया मॉडल क्यों नहीं बनाया जाए? कल्पना कीजिए कि किसी गणेश उत्सव समिति ने ₹2 लाख चंदा एकत्र किया। वह समिति यह निर्णय ले सकती है कि— 50% धार्मिक आयोजन और आवश्यक व्यवस्थाओं पर 20% सामाजिक सेवा पर 10% स्वच्छता और पर्यावरण पर 10% जरूरतमंद विद्यार्थियों की सहायता पर 10% आपातकालीन सहायता कोष में यह केवल एक उदाहरण है। वास्तविक अनुपात समिति और समुदाय अपनी आवश्यकता के अनुसार तय कर सकते हैं। इस तरह धार्मिक उत्सव केवल कुछ घंटों की रैली नहीं रहेगा, बल्कि पूरे वर्ष समाज के काम आने वाला सामुदायिक अभियान बन सकता है। हमें युवाओं की ऊर्जा को सही दिशा देनी होगी धार्मिक जुलूसों में सबसे अधिक उत्साह युवाओं में दिखाई देता है। यह ऊर्जा समाज की बहुत बड़ी ताकत है। इसी ऊर्जा से— - रक्तदान अभियान, - स्वच्छता अभियान, - पौधारोपण, - सड़क सुरक्षा जागरूकता, - नशामुक्ति अभियान, - शिक्षा सहायता, - डिजिटल साक्षरता जैसे अभियान चलाए जा सकते हैं। DJ पर नाचने में कुछ घंटे का आनंद मिल सकता है, लेकिन यदि वही युवा किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई में मदद करता है या किसी जरूरतमंद के लिए रक्तदान करता है, तो उस उत्सव का प्रभाव कहीं अधिक लंबे समय तक रहता है। धार्मिक उत्सव का अर्थ केवल उत्साह नहीं, जिम्मेदारी भी है धर्म हमें केवल अपनी खुशी के बारे में नहीं सिखाता। धर्म हमें संयम, सेवा, करुणा, अनुशासन और दूसरों के प्रति सम्मान* भी सिखाता है। इसलिए यदि हम भगवान की प्रतिमा लेकर सड़क पर निकल रहे हैं, तो हमें यह भी देखना चाहिए कि हमारे कारण किसी बुजुर्ग, बीमार व्यक्ति, विद्यार्थी, छोटे बच्चे या आम नागरिक को अनावश्यक परेशानी तो नहीं हो रही। हमारा उत्सव जितना बड़ा हो, हमारी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। हमें किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए? धार्मिक उत्सव बंद करने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि उन्हें और बेहतर बनाने की आवश्यकता है। कम दिखावा, ज्यादा सेवा। कम शोर, ज्यादा भक्ति। कम प्रतिस्पर्धा, ज्यादा सामाजिक एकता। कम अनावश्यक खर्च, ज्यादा जनहित। कम प्रदर्शन, ज्यादा जिम्मेदारी। यह किसी धर्म विशेष के खिलाफ सवाल नहीं है। यह हर धार्मिक और सामाजिक आयोजन के लिए आत्ममंथन का विषय है। निष्कर्ष गणेश विसर्जन हो, शोभायात्रा हो या कोई अन्य धार्मिक आयोजन—उत्सव हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं और इन्हें उत्साह के साथ मनाया जाना चाहिए। लेकिन हमें यह तय करना होगा कि हमारी आस्था की पहचान DJ की आवाज से होगी या हमारे अच्छे कामों से। यदि सार्वजनिक चंदे से लाखों रुपये एकत्र होते हैं, तो उसका कुछ हिस्सा ऐसे कार्यों में भी लगाया जा सकता है जिनका लाभ समाज को लंबे समय तक मिले। भगवान के सामने बजने वाला संगीत कुछ घंटों तक सुनाई देता है, लेकिन किसी गरीब बच्चे की शिक्षा, किसी जरूरतमंद की सहायता, किसी पेड़ का जीवन और किसी व्यक्ति की बचाई गई जान का प्रभाव वर्षों तक रहता है। शायद धार्मिक उत्सव का सबसे सुंदर रूप वही होगा जिसमें भक्ति भी हो, आनंद भी हो, संगीत भी हो—लेकिन उसके साथ संयम, सामाजिक जिम्मेदारी और सेवा की भावना भी हो। क्योंकि सच्ची आस्था केवल यह नहीं पूछती कि हमने भगवान के लिए कितना खर्च किया; वह यह भी पूछती है कि भगवान के नाम पर हमने समाज के लिए क्या किया।
